दैनिक अग्निहोत्र विधि –
1. एक बार अथवा तीन बार गायत्री या ओम् का भक्ति-भाव से उच्चारण करके अपने मन को अग्निहोत्र/देवयज्ञ के अनुकूल कर लें।
लेकिन मन अनुकूल स्थिति में हो या पहले ही प्राणायाम व ध्यान/संध्या कर चुके हैं तो यज्ञ के पहले गायत्री या ओम् उच्चारण की अनिवार्यता नहीं है।
2. संकल्पपाठ (दैनिक अग्निहोत्र के लिए वैकल्पिक)
3. आचमन
4. अंगस्पर्श
5. ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-उपासना के 8 मन्त्रों का भक्ति-भाव से पाठ (प्रत्येक मंत्र के पहले ओ३म् लगाएं)
6. दीपप्रज्वलन
7. कुंड में अग्निस्थापना
8. 3 समिधाएं रखें (4 मन्त्रों का प्रयोग)
9. पञ्च-घृत आहुति
10. जल-प्रसेचन
11. आघारावाज्यभागाहुति मंत्र से घी की चार आहुति
(मुख्य आहुति मंत्र – घी व हवन सामग्री की आहुति दें)–
12.प्रातः काल के 4 हवन मंत्र
यदि सुबह में ही सायंकालीन आहुति देनी हो तो इसके बाद सायंकाल के 4 मन्त्रों से आहुति दें(अर्थात जो केवल सुबह में ही हवन करना चाहें वो सायंकाल के 4 विशेष मन्त्रों से भी यहीं आहुति देवें)
13.प्रातः-सायंकालीन 8 मन्त्रों से आहुति
(अभी तक 16 हवन- घृत की आहुति हो गयी है)
14.चाहें तो गायत्री मन्त्रों से भी 3 आहुति दें
15.पूर्णाहुति- यज्ञ संपन्न
इसके बाद हाथ जोड़कर मन में प्रार्थना, शांति पाठ, जयकारा, यज्ञ कुंड की प्रदक्षिणा, सबको नमस्कार, प्रसाद वितरण आदि करें।
नोट –
*यज्ञकर्ता के लिए यज्ञोपवीत संस्कार का विधान है जिसका पालन करना चाहिए।
*घी (देशी गाय का बिलौना घी), हवन सामग्री, समिधाएं व मनोभाव पूर्णतः शुद्ध होनी चाहिए ऐसा हवन अनंत कल्याणकारी होता है। घी आदि की अशुद्धि से युक्त हवन यज्ञकर्ता के विनाश का कारण बनता है।
*यज्ञ सुबह सूर्योदय के बाद व शाम को सूर्यास्त से पहले करें।
आचमन मंत्र
ओ३म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।१।
ओ३म् अमृतापिधानमसि स्वाहा ।२।
ओ३म् सत्यं यश: श्रीर्मयि श्री: श्रयतां स्वाहा ।३।
(इन 3 मन्त्रों से दायें हथेली में जल लेकर 3 आचमन करें)
अंगस्पर्श मंत्र
ओ३म् वाङ्म आस्येऽस्तु ॥ इस मंत्र से मुख,
ओ३म् नसोर्मे प्राणोऽस्तु ॥ इस मंत्र से नासिका के दोनों छिद्रों,
ओ३म् अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों आखों,
ओ३म् कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों कान,
ओ३म् बाह्वोर्मे बलमस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों बाहु,
ओ३म् ऊर्वोर्म ओजोऽस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों जंघा पर जल से स्पर्श करें |
ओ३म् अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु ॥ इस मंत्र से पूरे शरीर पर जल छींटें |
अथ ईश्वर स्तुति– प्रार्थना-उपासना मंत्रा:
ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानिपरासुव ।
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥१॥
मंत्रार्थ – हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त शुद्धस्वरुप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हमें प्राप्त कराइये ।
ओ३म् हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥
मंत्रार्थ –जो स्वप्रकाश – स्वरूप और जिसने प्रकाश करने हेतु सूर्य – चन्द्रमा आदि पदार्थ को उत्पन्न करके धारण किया है, जो उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत का प्रसिद्ध स्वामी एक ही चेतनस्वरुप था, जो सब जगत के उत्पन्न होने से पूर्व वर्तमान था, वह इस भूमि और सूर्यादि को धारण कर रहा है, हम लोग उस सुखस्वरूप, शुद्ध परमात्मा की प्राप्ति के लिये योगाभ्यास व विशेष भक्ति किया करें ।
ओ३म् य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥
मंत्रार्थ – जो परमात्मा आत्मज्ञान का दाता शारीर,आत्मा और समाज के बल का देने वाला है, जिसकी सब विद्वान लोग उपासना करते हैं, जिसका प्रत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं, जिसका आश्रय ही मोक्ष सुखदायक है, और जिसका न मानना अर्थात भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुःख का कारण है, हम लोग उस सुखस्वरूप, सकल ज्ञान के देने वाले परमात्मा की प्राप्ति के लिये आत्मा व अंतःकरण से भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें ।
ओ३म् य: प्राणतो निमिषतो महित्वैकऽइद्राजा जगतो बभूव।
य ईशेऽअस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥
मंत्रार्थ – जो प्राणवाले और अप्राणिरूप जगत् का अपने अनंत महिमा से एक ही विराजमान राजा है, जो दो पैरों वाले मनुष्य और चार पैरों वाले गौ आदि प्राणियों के शरीर की रचना करता है, हम लोग उस सुखस्वरूप सकलैश्वर्य के देने वाले परमात्मा की उपासना अर्थात अपनी सकल उत्तम सामग्री को उसकी आज्ञा – पालन में समर्पित करके विशेष भक्ति करें ।
ओ३म् येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥
मंत्रार्थ – जिस परमात्मा ने तीक्ष्ण स्वभाव वाले सूर्य आदि और भूमि को धारण, जिस जगदीश्वर ने सुख को धारण और जिस ईश्वर ने दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है, जो अंतरिक्ष में स्थित समस्त लोक-लोकान्तरों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है , हम लोग उस सुखदायक कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए सब सामर्थ्य से विशेष भक्ति करें ।
ओ३म् प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥६॥
मंत्रार्थ – हे सब प्रजा के स्वामी परमत्मन ! आपसे भिन्न, दूसरा कोई उन और इन अर्थात दूर और पास स्थित समस्त उत्पन्न हुए जड़-चेतन पदार्थों को वशीभूत नहीं कर सकता (केवल आप ही इस जगत को वशीभूत रखने में समर्थ हैं), अर्थात आप सर्वोपरि हैं | जिस-जिस पदार्थ की कामना वाले हम लोग आपका आश्रय लेवें उस-उस पदार्थ की हमारी कामना सिद्ध होवे, जिससे हम लोग धन-ऐश्वर्यों के स्वामी होवें ।
ओ३म् स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥७॥
मंत्रार्थ – वह परमात्मा अपने लोगों का भ्राता के सामान सहायक, सकल जगत का उत्पादक, वह सब कामों को पूर्ण करने वाला है । वह समस्त विश्व को और नाम, स्थान, जन्मों को जानता है । जिस सांसारिक सुख – दुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त मोक्षस्वरूप धारण करने वाले परमात्मा में मोक्ष को प्राप्त होके विद्वान लोग स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश है अपने लोग मिलकर सदा उसकी भक्ति किया करें ।
ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानिदेव वयुनानि विद्वान ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥८॥
मंत्रार्थ – हे स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत के प्रकाश करने वाले, सकल सुखदाता परमेश्वर ! जैसे आप सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके हम लोगों को विज्ञान व राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराइए और हमसे कुटिलतायुक्त पापरूपकर्म को दूर कीजिये । इस कारण हम लोग आपकी बहुत प्रकार की स्तुतिरूप नम्रतापूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनंद में रहें ।
अग्न्याधान मंत्रः
ओ३म् भूर्भुव: स्व: ॥ (इस मंत्र से दीप जलाएं)
ओ३म् भूर्भुव: स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे ॥
(यज्ञ कुण्ड में इस मंत्र से अग्न्याधान करें)
अग्नि प्रदीप्त करने का मंत्र–
ओ३म् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते सँ सृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थेऽअध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥
(इस मंत्र से वेदी के बीच में अग्नि को धर, उसपर छोटे-छोटे काष्ठ और थोड़ा कपूर धर पंखे से अग्नि को प्रदीप्त करें)
समिदाधान के मंत्र
इस मंत्र से प्रथम समिधा रखें –
ओ३म् अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा । इदमग्नेयजातवेदसे – इदन्न मम ॥१॥
इन दो मन्त्रों से दूसरी समिधा रखें–
ओ३म् समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् |
आस्मिन हव्या जुहोतन स्वाहा || इदमग्नये – इदन्न मम ||२||
ओ३म् सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन| अग्नये जातवेदसे स्वाहा ||
इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम ||३||
इस मन्त्र से तीसरी समिधा रखें–
ओ३म् तन्त्वा समिदि्भरङि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छो चा यविष्ठ्य स्वाहा ।। इदमग्नेऽङिगरसे इदन्न मम ।।४।।
घृताहुति मंत्रः
ओ३म् अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा । इदमग्नेयजातवेदसे – इदन्न मम ॥१॥ (इस मन्त्र से घृत की पांच आहुति देवें )
जल – प्रसेचन मंत्रा:
ओ३म् अदितेऽनुमन्यस्व ।।
ओ३म् अनुमतेऽनुमन्यस्व ।।
ओ३म् सरस्वत्यनुमन्यस्व ।।
ओ३म् देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिंभगाय ।
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु ।।
चार घी की आहुतियाँ –
ओ३म् अग्नये स्वाहा | इदमग्नये- ‘इदन्न मम’ ।। (इस मन्त्र से वेदी के उत्तर भाग में आहुति दें)
ओ३म् सोमाय स्वाहा | इदं सोमाय – ‘इदन्न मम’ ।। (इस मन्त्र से वेदी के दक्षिण भाग में आहुति दें)
ओ३म् प्रजापतये स्वाहा | इदं प्रजापतये – ‘इदन्न मम’ ।।
ओ३म् इन्द्राय स्वाहा | इदं इन्द्राय – ‘इदन्न मम’ ।। (इन दो मन्त्रों से यज्ञ कुण्ड के मध्य में दो आहुति दें)
प्रातः कालीन आहुति के मन्त्र
ओ३म् सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा ।।१।।
ओ३म् सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा ।।२।।
ओ३म् ज्योतिः सूर्य: सुर्यो ज्योति: स्वाहा ।।३।।
ओ३म् सजूर्देवेन सवित्रा सजूरूषसेन्द्रव्यताजुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा ।।४।।
सायंकालीन आहुति के मन्त्र
ओ३म् अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्नि: स्वाहा ।।१।।
ओ३म् अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा ।।२।।
ओ३म् अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्नि: स्वाहा ।।३।। (मौन-आहुति)
ओ३म् सजूर्देवेन सवित्रा सजूरात्र्येन्द्रवत्याजुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा ।।४।।
प्रातःकालीन-सायंकालीन आहुति के समान मन्त्र
ओ३म् भूरग्नये प्राणाय स्वाहा ।
इदमग्नयेप्राणाय – ‘इदन्न मम’ ।।१।।
ओ३म् भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा ।
इदं वायवेऽपानाय –‘इदन्न मम’ ।।२।।
ओ३म् स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ।
इदमादित्याय व्यानाय-‘इदन्न मम’ ।।३।।
ओ३म् भूभुर्वः स्वरिग्नवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा ।
इदमग्निवाय्वादित्येभ्यःप्राणापानव्यानेभ्यः – ‘इदन्न मम’ ।।४।।
ओ३म् आपो ज्योतीरसोऽमृतंब्रह्म भूभुर्वः स्वरों स्वाहा ।।५।।
ओ३म् यां मेधांदेवगणाः पितरश्चोपासते ।
तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनंकुरू स्वाहा ।।६।।
ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानिपरासुव ।
यद भद्रं तन्न आसुव स्वाहा ।।७।।
ओ३म् अग्ने नय सुपथाराय अस्मान विश्वानिदेव वयुनानि विद्वान ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठांते नमऽउक्तिं विधेम स्वाहा ।।८।।
पूर्णाहुति
ओ३म् सर्वं वै पूर्णं स्वाहा ।।
(तीन बार घी से पूर्णाहुति करें)
शान्तिपाठ
ओ३म् द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः ।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।
ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
यज्ञ-प्रार्थना
यज्ञरूप प्रभो हमारे, भाव उज्ज्वल कीजिए ।
छोड़ देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिए ॥
वेद की बोलें ऋचाएँ, सत्य को धारण करें ।
हर्ष में हों मग्न सारे, शोक सागर से तरें ॥
अश्वमेधादिक रचाएँ, यज्ञ पर-उपकार को ।
धर्म मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को ॥
नित्य श्रद्धा- भक्ति से, यज्ञादि हम करते रहें ।
रोग पीड़ित विश्व के संताप सब हरते रहें ॥
कामना मिट जाए मन से, पाप-अत्याचार की ।
भावनाएँ शुद्ध होवें, यज्ञ से नर-नारि की ॥
लाभकारी हों हवन, हर प्राणधारी के लिए ।
वायु- जल सर्वत्र हों, शुभ गन्ध को धारण किए ॥
स्वार्थ भाव मिटे हमारा, प्रेम पथ विस्तार हो ।
‘‘इदन्न मम’’ का सार्थक, प्रत्येक में व्यवहार हो ॥
हाथ जोड़ झुकाये मस्तक, वन्दना हम कर रहे ।
नाथ करुणारूप करुणा, आपकी सब पर रहे ॥
गायत्री मंत्र
ओ३म् भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।