पंचतंत्र की कथाएँ, panchtantra hindi stories, गुरुकुल पंचतंत्र
जूनागढ़ में गिरनार पर्वत श्रृंखला की गोद में एक सुन्दर गुरुकुल है । जिसमें आचार्य जी बच्चों को जीवन में उपयोगी सभी विषयों की शिक्षा देते हैं । आचार्य श्री अपने शिष्यों को नीति, व्यवहार आदि जैसी बातों की शिक्षा कई बार रुचिपूर्ण कथाओं के माध्यम से देते हैं ।
गुरुकुल की एक सुबह –
आचार्य जी– प्रिय बालकों ! हमारे राष्ट्र भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा रहा है । गंभीर से गंभीर विषयों की शिक्षा भी अत्यंत सरल विधि से दी जाती थी । इसके लिए कई बार कथाओं का सहारा लिया जाता था तो कई बार गीतों, दोहों आदि का । आज मैं भी तुम्हें ‘मित्रभेद’ नाम की पंचतंत्र की एक कथा सुनाता हूँ । यह बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद कथा है । इसे ध्यान से सुनना ।
दक्षिण भारत में मणिपट्टन नामक एक नगर था । उसमें वर्धमान नामक एक व्यापारी रहता था । उसने धर्मानुसार व्यापार करके बहुत धन प्राप्त किया था। एक रात लेटे-लेटे वह सोचने लगा – मुझे और अधिक धन कमाना चाहिये; क्योंकि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसको धन से न प्राप्त किया जा सके। लोग धनिक व्यक्ति के ही मित्र बनते हैं। जिसके पास धन होता है, वह पूजने योग्य समझा जाता है ।
यह विचारकर उसने अगले ही दिन अपने गुरुजनों की आज्ञा ली और अपने बैलगाड़ी में बैठ मथुरा को चल दिया । उसके गाड़ी को दो बलिष्ठ बैल खींच रहे थे । उनके नाम थे – संजीवक और नन्दक । रास्ते में यमुना के किनारे संजीवक दलदल में फँस गया । खींचातानी में टाँग टूट जाने के कारण वह वहीं बैठ गया । संजीवक का कष्ट देखकर वर्धमान बहुत दुखी हुआ। वह तीन रात तक उसके ठीक होने की प्रतीक्षा करता रहा। तब उसके साथियों ने समझाया कि हिंसक पशुओं से भरे इस जंगल में इस तरह लंबे समय तक रुकना ठीक नहीं है । एक बैल के लिए सबका जीवन संकट में नहीं डालना चाहिये। बुद्धिमान लोगों का विचार है कि कम के लिए अधिक की हानि नहीं उठानी चाहिये। बुद्धिमानी तो इसमें है कि स्वल्प से ही अधिक की रक्षा हो सके ।
इस परामर्श को मानकर वर्धमान ने संजीवक को 2 रक्षकों के संरक्षण में छोड़ शेष साथियों के साथ आगे प्रस्थान किया, किन्तु दूसरे दिन ही वे रक्षक भी वन्य पशुओं के डर से उस घायल बैल को वहीं छोड़कर भाग गये । वर्धमान से मिलने पर उन्होंने कह दिया कि संजीवक मर गया था | अपने प्रिय बैल की मृत्यु का समाचार सुन वर्धमान बहुत दुखी हुआ ।
उधर संयोग से संजीवक धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। यमुना के तट की हरी-भरी घास चरकर वह ऐसा लगने लगा, जैसे शिव का नन्दी। पीठ पर उसका ककुद देखते ही बनता था। मस्ती में भरकर कभी वह जंगल में दीमक-मिट्टी के टीलों में सींग मारता और कभी डकराता हुआ घूमता रहता।
उसी जंगल में पिंगलक नाम का शेर रहता था। एक बार वह यमुना के तट पर पानी पीने के लिए पहुँचा। उसने दूर से ही संजीवक की गम्भीर डकराहट सुनी, तो वह भयभीत हो गया। वहीं बरगद का एक पेड़ था, पिंगलक अपनी प्रजा हिरण आदि के साथ वहीं बैठ गया ।
करटक और दमनक नामक दो सियार भी उस शेर के दल के पीछे-पीछे रहते थे। वे पिंगलक के भूतपूर्व मन्त्री के पुत्र थे। उन सियारों ने अपने स्वामी पिंगलक को प्यासा होने पर भी बिना पानी पिये इस तरह अचानक बैठ जाते देखा, तो इसपर दमनक ने पूछा- भाई करटक ! स्वामी यमुना-तट से थोड़ी दूर अपने सैन्य-मण्डल के साथ बरगद के पेड़ के नीचे निराश होकर क्यों बैठ गये हैं?
करटक ने कहा – अरे भाई ! हमें इस बात से क्या मतलब ? जो प्राणी व्यर्थ का काम करना चाहता है, उसका वैसा ही विनाश हो जाता है, जैसे कील उखाड़ने वाले मूर्ख बन्दर का हुआ ।
हमें भी व्यर्थ के चक्कर में न पड़कर स्वामी से बचे हुए भोजन को खाना चाहिये।
दमनक ने कहा – करटक, तुम तो केवल भोजन की ही बात करते हो । केवल पेट के लिए जीना भी कोई जीना है भला ?
करटक ने कहा- भाई ! हम तो मामूली जीव हैं। हमको इस सबसे क्या मतलब ? यदि मामूली व्यक्ति राजा के सामने अपना मुँह खोलता है, तो उसको सम्मान नहीं मिलता। इसलिए बोलना वहीं उचित है, जहाँ उसका कुछ फल हो।
दमनक ने कहा – मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ। अरे भाई ! राजा की सेवा करके तो मामूली व्यक्ति भी प्रमुख बन जाता है और सेवा न करे, तो प्रधान व्यक्ति भी साधारण बन जाता है ।
करटक ने पूछा – तो तुम क्या करना चाहते हो ?
दमनक ने कहा – आज हमारे स्वामी पिंगलक भयग्रस्त हैं। मैं नीति से, उपाय से समझाकर उनके मन से उनका यह भय निकाल दूँगा । इस सेवा से उन्हें प्रसन्न करके मैं मन्त्री पद प्राप्त करूँगा ।
दमनक की इन बातों से अब करटक भी सहमत हो गया ।
दमनक वहाँ से पिंगलक के दरबार की ओर गया ।
पिंगलक ने दमनक को आते देखा, तो प्रहरी को आज्ञा दी – दमनक हमारे पुराने मन्त्री का पुत्र है । उसको आने दो !
दमनक ने पिंगलक को प्रणाम किया और पिंगलक ने उसका कुशल समाचार पूछा।
दमनक ने कहा – आपकी सेवा में कुछ निवेदन करना चाहता हूँ । मैं तो वंश-परम्परा से आपका सेवक हूँ । संकटकाल में भी आपका अनुयायी रहा हूँ । मैं सियार-जैसा छोटा प्राणी अवश्य हूँ, लेकिन जैसे कीड़ों से रेशम, पत्थरों से सोना तथा कीचड़ से कमल पैदा होता है, वैसे ही गुणों के कारण व्यक्ति की सही पहचान होती है, केवल जन्म के कारण नहीं।
तब पिंगलक ने कहा – तुम्हारी बातों से मैं प्रसन्न हुआ । अब तुम्हें जो कुछ कहना है, निर्भय होकर कहो ।
दमनक ने एकान्त में अपनी बात कहने की प्रार्थना की । जब दरबार के अन्य जानवर हट गये, तब दमनक ने पूछा – स्वामी ! आप तो यमुना-तट पर पानी पीने जा रहे थे, फिर प्यासे रहकर यहाँ क्यों रुक गये ?
पहले तो पिंगलक कुछ झिझका, फिर दमनक को योग्य समझकर उसने कहा – दमनक ! यह जो गर्जन का शब्द मुझे दूर से ही सुनाई दे रहा है, तुम भी सुन रहे होगे । इस जंगल में कोई अद्भुत शक्तिशाली प्राणी आ गया है । जिसका गर्जन ही इतना आतंककारी है, वह स्वयं कितना बलशाली होगा ? इसीलिए मैं इस जंगल को छोड़ना चाहता हूँ ।
दमनक ने कहा – स्वामी ! केवल गर्जन से डरकर जंगल छोड़ना उचित नहीं होगा । नगाड़ा, बांसुरी, वीणा, मृदंग और शंख आदि वाद्य नाना प्रकार के उच्च व भयंकर शब्द उत्पन्न करते हैं । शब्द से क्या डरना ! आप धीरज धारण करें । पहले यह पता लगाना चाहिये कि इस ढोल में कितना पोल है।
केवल शब्द से नहीं डरना चाहिये । दमनक से पिंगलक ने कहा – भाई! मैं क्या करूँ ? जब मेरे सब अनुयायी और साथी भयभीत हैं, तब मैं कैसे धीरज रख सकता हूँ ?
दमनक ने कहा – इसमें आपके अनुचरों का क्या दोष ? जैसा स्वामी करेंगे, वैसा ही अनुचर करेंगे । इसलिए जब तक मैं इस शब्द के कारण का पता लगाकर न आऊँ, तब तक आप यहीं रहिये ।
पिंगलक ने आश्चर्य से पूछा – क्या तुम सचमुच वहाँ जाने की हिम्मत रखते हो ?
दमनक ने उत्तर दिया – स्वामी के आदेश से योग्य सेवक बड़े-से-बड़ा काम पूरा कर सकता है ।
पिंगलक ने कहा – यदि ऐसी बात है, तो जाओ ! तुम्हारा मार्ग शुभ हो !
दमनक उसको प्रणाम करके शब्द की दिशा में चल दिया।
तभी पिंगलक को अपनी भूल का आभास हुआ। उसे पश्चात्ताप होने लगा कि मैंने व्यर्थ ही दमनक की बातों में आकर अपने मन का भेद तो नहीं खोल दिया । उसका क्या भरोसा ? खैर, अब तो एक ही उपाय है कि कहीं दूसरी जगह छिपकर दमनक के आने की राह देखता रहूँ ।
उधर दमनक जब संजीवक के पास पहुँचा, तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। जिससे डरकर वनराज के प्राण सूखे जा रहे थे, वह तो एक बैल था । दमनक इस स्थिति से लाभ उठाने की सोचने लगा । ऊपर से मित्रता और अन्दर से द्वेष, दोनों के बल पर पिंगलक को अपने वश में किया जा सकता है, यह सोचकर वह पिंगलक के पास गया ।
पिंगलक उसे देखकर सँभल गया । लेकिन उसने अपने मन का डर प्रकट नहीं होने दिया ।
दमनक ने पिंगलक को प्रणाम किया।
पिंगलक ने पूछा – देख आये उस प्राणी को ?
दमनक ने कहा – जी आपकी कृपा से मैं उसे देख आया हूँ । यह सच है कि वह अत्यंत शक्तिशाली है और हम कमजोर , फिर भी यदि स्वामी की आज्ञा हो, तो मैं उसको आपकी सेवा में ला सकता हूँ।
पिंगलक ने अचम्भे से पूछा – सचमुच ?
दमनक ने कहा – बुद्धि के बल पर कोई भी काम असम्भव नहीं है।
तब पिंगलक ने कहा – यदि ऐसी बात है, तो आज ही से मैं तुमको अपना मन्त्री बनाता हूँ ।
इसके बाद दमनक उस बैल के पास गया और बोला – अरे ओ बैल ! इधर आ । इस जंगल के राजा, मेरे स्वामी पिंगलक तुम्हें बुला रहे हैं । इस प्रकार निडर होकर डकराने का तुझे साहस कैसे हुआ ?
यह सुनकर संजीवक की कँपकँपी छूट गयी। वह कातर स्वर में उससे बोला – यदि तुम अपने स्वामी से अभयदान दिलवाओ, तो मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ ।
दमनक ने कहा – ठीक है । तो मैं अभी अपने स्वामी से पूछकर आता हूँ । उसने पिंगलक के पास जाकर कहा – स्वामी ! वह बैल कोई साधारण जीव नहीं है । वह भगवान शंकर का बड़ा भक्त है । उसने बताया है कि स्वयं भगवान शंकर की आज्ञा से वह यमुना के तट पर हरी घास चरता है और इस जंगल में विचरण करता है ।
पिंगलक मन-ही-मन डर गया और बोला – यह सच ही है; क्योंकि बिना देवता की कृपा से कोई प्राणी इस भयंकर जंगल में इस प्रकार से निडर हो कर विचरण नहीं कर सकता ।
दमनक बोला- लेकिन मैंने उससे कह दिया है कि यह वन भगवती चण्डिका के वाहन मेरे स्वामी सिंह पिंगलक के अधिकार में है, इसलिए तुम्हें उनके समीप चलकर भाईचारे के साथ इस वन में खाना-पीना और विचरण करना चाहिये । उसने मेरी बात मान ली और आपसे अभयदान माँगा है ।
दमनक की इस बात से पिंगलक बहुत प्रसन्न हुआ । वह उसकी बुद्धि की प्रशंसा करते हुए बोला – मेरे प्रिय मंत्री ! तुम धन्य हो ! जाओ और उसे कह दो की मैंने उसको अभयदान दिया । लेकिन मुझे भी उससे अभयदान दिलाकर उसे मेरे पास ले आओ ।
दमनक अपनी बुद्धि और भाग्य पर इतराता हुआ संजीवक के पास पहुँचा और उससे बोला – मित्र ! मेरे स्वामी ने तुम्हें अभयदान दिया है । अब बिना किसी भय के मेरे साथ चलो । किन्तु स्मरण रहे, राजा की निकटता और कृपा पाने के बाद कहीं मेरे उपकार को भूल ना जाना । मुझसे सदा मित्रता ही रखना । ऐसा करने से हम दोनों को राज्य-लक्ष्मी का लाभ होगा। जो प्राणी घमण्ड के कारण उत्तम, मध्यम और अधम का सम्मान नहीं करते, वे राजा से सम्मान पाने के बाद भी पतन को प्राप्त होते हैं। इसपर दमनक ने संजीवक को दंतिल की कथा दूसरों का सम्मान सुनाया । यह कथा सुनकर संजीवक ने उसकी बात मान ली और उसके साथ पिंगलक के पास गया ।
संजीवक ने आकर पिंगलक को प्रणाम किया और उसके समीप बैठ गया ।
तब पिंगलक सिंह ने प्रसन्नता से संजीवक बैल से कहा – हे महात्मा ! आपकी इस जंगल में उपस्थिति से हम धन्य हुए । बताएं आप यहाँ कुशल से तो रहते हैं ?
पिंगलक की बात सुन संजीवक भी प्रसन्न हुआ और अपनी कुशलता व्यक्त की ।
पिंगलक ने पुनः उससे कहा – आप निर्भय होकर मेरे द्वारा सुरक्षित इस वन में विचरण करें । इसके बाद पिंगलक ने अपने जंगल का राजकाज करटक और दमनक को सौंप दिया और स्वयं संजीवक के साथ आनन्द से रहने लगा।
संजीवक ने कुछ दिनों में ही अपनी बुद्धि के प्रभाव से पिंगलक को जंगली आदतों से छुड़ाकर ग्राम्य-धर्म में लगा दिया। पिंगलक भी अब संजीवक की बातों में रुचि लेने लगा। उसकी हिंसा की वृत्ति मंद पड़ने लगी । अब वह दूसरे जानवरों को अपने नज़दीक नहीं आने देता था। करटक और दमनक को भी दूर ही रखता था ।
परिणाम यह हुआ कि सिंह के शिकार से बचे हुए भोजन को खाने वाले छोटे-छोटे जानवर भूख से व्याकुल हो गये । करटक, दमनक और दूसरे जानवर इस स्थिति पर चिन्ता करने लगे ।
दमनक ने करटक से कहा – अरे भाई ! अब तो पिंगलक और संजीवक से इतनी मित्रता हो गयी है कि पिंगलक हम लोगों से विमुख हो गया है । हमारे सब साथी भी भाग गये हैं । हमें राजा को समझाना चाहिये । मन्त्री का धर्म है कि वह उचित समय पर राजा को समझाये ।
करटक ने कहा – दोष तुम्हारा है । तुम्हीं ने इस घास चरने वाले जानवर को हमारे स्वामी का मित्र बनाया है।
दमनक बोला- यह सत्य है कि दोष मेरा ही है, हमारे स्वामी का नहीं । हमारी स्थिति वैसी ही है, जैसे दूसरे का काम करने में दूती की और आषाढ़भूति नामक व्यक्ति की हुई थी । करकट ने पूछा कैसे ? तो दमनक ने उसे सन्यासी का लोभ कथा सुनाई |
यह सब सुनकर करटक ने पूछा – ऐसी अवस्था में अब हमको क्या करना चाहिये ?
दमनक ने कहा – अब मैं अपनी बुद्धि का प्रयोग करके पिंगलक और संजीवक को अलग-अलग कर दूँगा ।
करटक ने डरते हुए पूछा – यदि तुम्हारे इस कपट-व्यवहार का पता पिंगलक और संजीवक को लग गया, तब क्या होगा ?
फिर दमनक ने अपनी कपटता, उपाय युक्ति की क्षमता, बुधिमत्ता का बखान करते हुए करकट को बनावटी विष्णु, चतुराई, बगुला भगत , और बुद्धि-बल कथा सुनाई |
फिर जब दमनक ने पिंगलक को संजीवक से अलग देखा, तब उसके पास गया और उसको प्रणाम करके सामने बैठ गया।
पिंगलक ने पूछा- तुम्हें बहुत दिनों बाद देखा है ?
दमनक ने उत्तर दिया – मैं बिना प्रयोजन के आपके पास क्यों आता ? राजकाज में गड़बड़ देखकर मैं व्याकुल हो गया, इसलिए बताने के लिए अपने-आप आ गया हूँ। यदि कोई किसी का पराभव नहीं चाहता, तो शुभ-अशुभ, प्रिय और द्वेषपूर्ण बात हित करने वाली हो, तो भी बिना पूछे ही कह देनी चाहिये।
पिंगलक ने कहा – जो भी कहने योग्य बात है, उसे कहो ।
दमनक ने कहा – स्वामी ! संजीवक आपके प्रति द्रोह रखता है । मुझे उसने अकेले में बताया है कि उसने आपका सार और असार सब समझ लिया है। अब वह आपको मारकर राज्य हथियाने के चक्कर में है।
यह सुनकर पिंगलक विमूढ़-सा चुप रह गया । दमनक भी उसका मुँह देखकर ताड़ गया कि यह तो संजीवक के प्रेम में बँधा हुआ है ।
पिंगलक ने कहा – संजीवक तो मेरा प्राणों के समान अनुचर है । वह मेरे प्रति द्रोह-बुद्धि क्यों रखेगा ?
दमनक ने कहा – स्वामी ! यह आवश्यक नहीं है कि सेवक हमेशा सेवक ही बना रहे । राजा का कोई भी सेवक ऐसा नहीं होता, जो वैभव की अभिलाषा न रखता हो ।
पिंगलक बोला – कुछ भी हो, मेरे मन में उसके प्रति कोई विकार नहीं है ।
दमनक ने कहा – स्वामी ! आपने उस गुणहीन संजीवक में ऐसे कौन-से गुण देखे हैं, जिनके कारण आप उसे अपने समीप रखते हैं ? यदि आप सोचते हैं कि वह बड़े शरीर वाला है और शक्तिशाली है या उसके द्वारा शत्रुओं को नष्ट करायेंगे, तो यह काम भी उससे नहीं हो सकता । भलाई इसी में है कि आप उसे अपराधी बताकर मार डालिये ।
पिंगलक ने आश्चर्य से कहा – तुम्हारे कहने पर ही मैंने उसको अभय प्रदान किया था, अब मैं स्वयं ही उसको कैसे मारूँ ? आखिर संजीवक हमारा मित्र है । यदि उसमें द्रोह-बुद्धि भी है, तो भी मैं उसके विरुद्ध कुछ नहीं करूँगा ।
दमनक ने समझाया – स्वामी ! द्रोह-बुद्धि वाले को क्षमा करना राजधर्म नहीं है। उसकी मित्रता के कारण आपने राजधर्म का त्याग कर दिया है। आपके सभी अनुयायी और परिजन राजधर्म का अभाव देखकर आपसे विमुख हो गये हैं । जब आपने शिकार करना छोड़ दिया है, तो आपके अनुयायियों को भोजन कैसे प्राप्त होगा ? भोजन न मिलने के कारण वे आपको त्यागकर चले गये । इसपर दमनक ने उसे कुसंग का फल और अनजाने की दोस्ती कथा सुनाई |
पिंगलक ने कहा – मुझे तो अब भी विश्वास नहीं होता कि संजीवक मेरे प्रति कोई दुर्भावना रखता है ।
दमनक ने कहा – आज ही उसने मेरे सामने आपको मारने की प्रतिज्ञा की है। जब वह प्रातःकाल आपके सामने आयेगा, तो आप स्वयं जान जायेंगे । उसका मुँह और आँखें लाल-लाल होंगी, होठ फड़क रहे होंगे, वह आपको क्रूर दृष्टि से देखेगा । मैंने अपना धर्म समझकर आपको सावधान कर दिया है। आगे आप जो उचित समझें, करें ।
दमनक अब संजीवक के पास पहुँचा । संजीवक ने उसका स्वागत करते हुए कुशल समाचार पूछा । दमनक ने कहा – सेवकों के जीवन में कुशलता कहाँ !
संजीवक ने पूछा – तुम ऐसा क्यों कहते हो ?
दमनक ने कहा – मन्त्री होने के नाते मन्त्र-भेद करना ठीक नहीं है, फिर भी आपके स्नेह-पाश में बँधे होने के कारण मैं मन्त्र-भेद कर रहा हूँ। अब, पिंगलक के मन में आपके प्रति दुर्भावना आ गयी है । वह सोचता है कि आपको मारकर अपने समस्त परिवार के लिए काफ़ी समय के लिए भोजन का प्रबन्ध कर लेगा । मैंने तो उसको मना भी किया कि मित्र-द्रोह अनुचित है, किन्तु पिंगलक मुझ पर ही क्रुद्ध हो गया।
दमनक सियार के कठोर वचनों को सुनकर पहले तो संजीवक बेहोश-सा हो गया। फिर वह सचेत होते हुए कहने लगा- मैंने उसके साथ मित्रता करके ठीक नहीं किया। मित्रता तो सदा समानता वाले व्यक्तियों में होना चाहिये । मुझे लगता है कि मेरे प्रति मेरे स्वामी की कृपा को देखकर कुछ समीप रहने वालों ने उन्हें भड़का दिया है। इसीलिए मेरे जैसे निर्दोष जीव के सम्बन्ध में भी वह ऐसा सोचते हैं।
दमनक ने कहा – यदि ऐसा है, तो भी भयभीत नहीं होना चाहिये। यदि दुर्जनों ने उसे भड़काया और नाराज़ किया है, तो आपके मीठे वचनों को सुनकर वह खुश हो जायेगा।
संजीवक ने कहा – तुम्हारी बात ठीक नहीं है । दुर्जनों के बीच नहीं रहा जा सकता; क्योंकि वे कोई न कोई उपाय करके सज्जनों का नाश करने का प्रयास कर्त्ये ही हैं । जो विद्वान् होकर भी क्षुद्र है, वह उचित-अनुचित का विचार छोड़कर कपट-व्यवहार से अपनी जीविका कमाता है | ऐसा कहकर संजीवक ने क्षुद्र पंडित की कथा सुनाई |
यह कथा सुनाकर संजीवक बोला – मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि तुम्हारे राजा के परिवार में क्षुद्र लोग भरे पड़े हैं । इसलिए तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूँ?
दमनक ने कहा – आप किसी दूसरे देश में चले जायें; क्योंकि ऐसे दुष्ट स्वामी की सेवा नहीं करनी चाहिये।
संजीवक बोला – स्वामी के नाराज़ होने पर भी मैं और कहीं नहीं जा सकता और न दूसरी जगह जाने से मुझे कोई लाभ होगा । इसलिए मेरे सामने युद्ध के अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।
उसकी यह बात सुनकर दमनक ने सोचा कि यदि इसने अपने पैने सींगों से स्वामी पर आक्रमण कर दिया, तो बहुत बुरा होगा । यह सोचकर दमनक ने फिर उससे कहा – कहते तो आप ठीक हैं, किन्तु स्वामी और सेवक की लड़ाई अनुचित है । जो व्यक्ति अपने शत्रु के बल और पराक्रम को पूरी तरह समझे बिना उससे लड़ता है, उसे उसी प्रकार पराजय का सामना करना पड़ता है, जैसे टिटिहरी से समुद्र को पराजय का सामना करना पड़ा । फिर दमनक ने संजीवक को टिटिहरी और समुद्र की कथा कथा सुनाई |
संजीवक बोला – समझ में नहीं आता कि अचानक वह दुष्ट-बुद्धि कैसे हो गया ?
दमनक ने कहा – यह तो तुम्हारे विश्वास की बात है। यदि तुमको देखकर उसकी आँखें लाल हो जायें, भृकुटियाँ तन जायें, तो तुम समझ लेना कि वह दुष्ट-बुद्धि हो गया है । यदि ऐसा न करे, तो तुम समझना कि वह तुम पर प्रसन्न है । अब मैं जाता हूँ । यदि जा सकते हो, तो सायंकाल तक इस जंगल को छोड़कर चले जाओ। बलवान् व्यक्ति के आक्रमण करने पर वहां से चले जाना चाहिये या उसके अधीन हो जाना चाहिये । साम, दाम, दण्ड व भेद किसी भी उपाय से तुम्हें अपनी रक्षा करनी चाहिये। यह कहकर दमनक वापस चला गया ।
जब वह करटक के पास पहुँचा, तो करटक ने पूछा – कहो, क्या कर आये ?
दमनक – मैंने भेद-भाव पैदा करने वाले नीति के बीज बो दिये हैं । अब आगे देखो क्या होता है ।
करटक ने कहा – यह तुमने ठीक नहीं किया । दो स्नेह करने वाले हृदयों को तुमने क्रोध के सागर में डाल दिया है।
दमनक ने कहा – तुम नीति नहीं समझते, इसीलिए ऐसी बातें करते हो। उसने मेरे मन्त्रिपद का अपहरण कर लिया है, इसलिए वह मेरा शत्रु है, इसीलिए मैंने उसे मारने का षड्यन्त्र किया है । यदि उसका वध न हुआ, तो उसे जंगल तो छोड़ना ही पड़ेगा । हम अपना बदला भी ले लेंगे, मन्त्री का पद भी मिलेगा । अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए लोग दूसरे को कष्ट भी देते हैं। मूर्ख आदमी अपने भोजन का प्रबन्ध करने में भी समर्थ नहीं होता। हमें चतुरक नामक सियार की तरह चतुराई से काम लेना होगा। करकट के पूछने पर दमनक ने उसे समझदार का स्वार्थ कथा सुनाई |
इधर दमनक के जाने के बाद संजीवक सोचने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला ? मैं तो घास खाने वाला प्राणी हूँ और मांस खाने वाले प्राणी का अनुचर बन गया। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? क्यों न पिंगलक के पास ही चला जाऊँ । शायद दमनक की बात सही ना हो।
यदि मैं किसी दूसरे स्थान पर जाता हूँ और वहाँ कोई दूसरा जानवर मुझपर आक्रमण करता है, तो उससे अच्छा है यहाँ पिंगलक से ही मुकाबला कर लूँ । यह निर्णय कर वह धीरे-धीरे सिंह के स्थान की ओर बढ़ते-बढ़ते कहने लगा – यदि किसी घर में साँप छिपा हो, किसी वन में आग लगी हो, कमलों से भरे किसी सुन्दर सरोवर में घड़ियाल छिपा हो, तो कोई भी आशंकित प्राणी उनके निकट जाने में बड़ा कष्ट अनुभव करता है। इसी प्रकार झूठ बोलने वाले दुर्जनों से घिरे हुए राजा के भवन में जाने पर सज्जन व्यक्ति को कष्ट अनुभव होता है। यह कहते हुए जब वह पिंगलक के पास पहुँचा, तो उसने पिंगलक को दमनक द्वारा बताये हुए रूप में देखा। इससे संजीवक को आश्चर्य हुआ। अपने को संभालते हुए वह प्रणाम करके दूर ही बैठ गया।
पिंगलक ने इस रूप में उसे दूर बैठते देखा, तो दमनक की कही बात को सच मान गया। क्रोध में आकर पिंगलक ने उस पर आक्रमण कर दिया। उसने पैने नाखुनों से संजीवक की पीठ को घायल कर दिया। संजीवक ने भी अपने सींगों से पिंगलक के पेट पर आक्रमण किया। दोनों ही एक-दूसरे को मार डालने की मुद्रा में तनकर खड़े हो गये।
उन दोनों को देखकर करटक ने दमनक से कहा- अरे मूर्ख ! तूने इन दोनों में वैर-भाव बढ़ाकर बहुत बुरा किया। यदि तुम्हारे अन्दर शक्ति और समझ हो, तो इस संकट को टालने का उपाय निकालो। ऐसे समय ही मन्त्री की बुद्धि की परीक्षा होती है। कठिनाई यह है कि ऐसा करना भी तुम्हारे लिए सम्भव नहीं है; क्योंकि तुम विपरीत बुद्धि के प्राणी हो। मूर्ख को उपदेश देने से कोई लाभ नहीं है; क्योंकि जो लकड़ी झुक नहीं सकती, उसको टेढा नहीं किया जा सकता। पत्थर पर उस्तरे की धार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अयोग्य शिष्य को उपदेश से कोई लाभ नहीं होता। यह कहकर करकट ने कुपात्र को उपदेश का परिणाम कथा सुनाई |
फिर उसने कहा मूर्ख को उपदेश देने से उनका क्रोध ही बढ़ता है, जैसे साँपों को दूध पिलाने से उनका ज़हर ही बढ़ता है। ऐसी ही स्थिति में एक मूर्ख बन्दर ने एक गृहस्थ को बेघर बना दिया था। फिर करकट ने वानर बुद्धि कथा सुनाई |
करटक ने दमनक से कहा- जैसे एक स्वार्थी बेटे ने व्यर्थ के पाण्डित्य के कारण धुएँ में अपने पिता के प्राण ले लिये। अरे मूर्ख ! तूने भी अपने स्वामी पिंगलक के प्राण संकट में डाल दिये हैं। करकट ने यहाँ धर्मबुद्धि और पापबुद्धि कथा सुनाई |
फिर करटक ने दमनक से कहा- तुम सचमुच दुष्ट एवं कुटिल हो। यदि लोहे की तराजू को चूहे खाने लगें, तो बालक को भी बाज़ पक्षी उड़ाकर ले जा सकता है। दमनक ने पूछा वह कैसे, तो करकट ने उसे जैसे को तैसा कथा सुनाई ।
कथा सुनाकर करटक ने दमनक से पुनः कहा- मूर्ख ! तूने हित को अनहित में बदल दिया। इसीलिए कहा है कि यदि शत्रु विद्वान् व्यक्ति हो, तो भी अच्छा है; मूर्ख व्यक्ति कितना भी हितैषी बने, तो भी अनुचित है, जैसे बन्दर के हितैषी बनने पर राजा को अपने प्राण गवाने पड़े और चोर ने मित्र बनकर विद्वान के प्राण बचाये। फिर करकट ने एक और कथा सुनाई – मूर्ख मित्र से विद्वान शत्रु श्रेष्ठ होता है ।
इधर लड़ते-लड़ते पिंगलक और संजीवक बहुत घायल हो गए । दोनों खून से लथ-पथ हो गए थे । यह देख करकट से न रहा गया और उसने आगे बढ़कर पिंगलक को रोका और उसे दमनक की सभी स्वार्थपूर्ण बातें बता दी । करकट ने राजा को बताया कि उसके और संजीवक के बैर के पीछे वास्तव में दमनक का हांथ था ।
यह सुनकर पिंगलक बहुत क्रोधित हुआ और तत्काल दमनक को मृत्यु दंड दे दिया |
पिंगलक ने कहा – “इसीलिए हमारे बड़ों ने कहा है कि दुष्ट-बुद्धि का संग कभी नहीं करना चाहिए | दमनक स्वार्थी और दुष्ट-बुद्धि का था | मुझे उसपर पहले से ही संदेह था, लेकिन पूरी बात मैं समझ नहीं पाया |”
राजा पिंगलक ने अब करकट को अपना मंत्री और संजीवक को अपना सलाहकार बनाया और न्यायपूर्वक जंगल में राज करने लगा |
कथा समाप्त हुई | सभी बच्चे इस लम्बी कथा को सुनकर प्रसन्न मुद्रा में थे | सबने बारी-बारी से आचार्य जी के चरण स्पर्श किए और वहां से प्रस्थान किया |