विदुर-नीति, महाभारत, प्रेरक कथाएँ

नर्मदा नदी के किनारे एक साधना केंद्र है । यह केंद्र बड़े सुन्दर व साधना के अनुकूल स्थान पर स्थित है | यहाँ युवाओं व गृहस्थों की आत्मोन्नति के लिए कक्षाओं व शिविरों का समय-समय पर आयोजन होता है | इस साधना केंद्र के आचार्य अपने ज्ञान, सरल स्वभाव और नीति संबंधी उपदेशों के लिए प्रसिद्ध हैं ।
एक दिन प्रातःकाल का समय था । साधना केंद्र के यज्ञशाला में आचार्य जी दैनिक अग्निहोत्र यज्ञ के बाद अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे । तभी रमेश भाई नाम का एक व्यक्ति भी वहाँ आया उसने आचार्य जी को प्रणाम किया और वह भी बैठकर उपदेश सुनने लगा । रमेश भाई राजकोट का एक प्रसिद्ध हीरा-व्यापारी था | वह आचार्य श्री से एक बार पहले भी मिल चुका था ।
उसके चेहरे पर आज चिंता की गहरी रेखाएँ थीं । आँखें थकी हुई थीं और ऐसा लग रहा था मानो वह कई रातों से ठीक से सोया न हो । लेकिन आचार्य श्री के मुख से उपदेश सुनकर अब उसे अच्छा लगने लगा । थोड़ी देर के लिए तो वह भूल ही गया कि वह किसी तनाव में भी है ।
उपदेश समाप्त होने पर जब सभी शिष्य आचार्य जी को प्रणाम कर वहाँ से अपने अन्य दैनिक कार्य के लिए प्रस्थान कर गए , तब रमेश भाई आचार्य जी के निकट आया और अपना परिचय दिया |
तब आचार्य जी ने रमेश भाई से प्रेमपूर्वक पूछा—
“रमेश भाई आप बहुत परेशान दिखाई दे रहे हैं। क्या बात है?”
रमेश भाई ने गहरी साँस लेते हुए कहा- “आचार्यवर! मेरे जीवन में सब कुछ उलझ गया है। कई दिनों से मुझे रात में नींद नहीं आ रही है । मन हर समय चिंता से भरा रहता है।”
“थोड़ा विस्तार से बताओ रमेश भाई ।”
रमेश भाई ने बोला—
“एक बहुत धनी व्यापारी है | कई राजनेताओं से भी उसकी मित्रता है | व्यापार संगठन में भी उसका अच्छा प्रभाव है | कुछ वर्षों से हम एक-दुसरे के साथ मिलकर व्यापार कर रहे थे | सब ठीक चल रहा था लेकिन अभी किसी कारण से हम दोनों की अनबन हो गई है । मैं उससे कमजोर हूँ, इसलिए मन में हर समय भय बना रहता है।
इस विवाद के कारण व्यापार में भी मुझे हानि हुई है तथा धन की कमी होने लगी है।
इसके अलावा कुछ समय पहले मेरे घर में चोरी भी हो गई | मेरा बहुत-सा सामान चोर ले गए ।
इन सब घटनाओं से मेरे मन में यह चलता रहता है की मैं अधिक से अधिक धन कमाऊँ तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करूँ।
इन चिंताओं के कारण रातभर करवटें बदलता रहता हूँ । समझ नहीं आता कि मेरी शांति कहाँ चली गई है।”
आचार्य जी मुस्कुराए ।
“रमेश भाई, तुम्हारी समस्या के समाधान के लिए मैं तुम्हें एक नगर में रहने वाले पाँच व्यक्तियों की कहानी सुनाता हूँ । इसे ध्यान से सुनो |”
पाँच व्यक्तियों की रात
एक समय की बात है। सुरेन्द्र नगर नामक एक नगर में पाँच व्यक्ति–भोला, गरीबदास, रत्नसेन, कामेश और चोरक रहते थे। संयोग से एक रात वे सभी एक ही धर्मशाला में ठहरे थे । बाहर वर्षा हो रही थी और रात काफी अँधेरी थी। ये पाँचों आपनी – अपनी समस्याओं को लेकर दुखी थे |
भोला का उसका विवाद नगर के एक अत्यंत दुष्ट गुंडे से हो गया था। जबकि वह स्वयं एक साधारण दुकानदार था।
गरीबदास के पास परिवार का पालन-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। उसके पास न खेती थी, न कोई व्यवसाय। वह दिन-रात यही सोचता रहता कि उसके परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा।
रत्नसेन के घर से कुछ दिन पहले चोरों ने उसका सारा धन चुरा लिया था। वर्षों की कमाई एक ही रात में चली गई थी।
कामेश के पास वैसे बहुत धन था, पर उसकी इच्छाएँ उससे भी अधिक थीं। उसे हर समय नई-नई वस्तुएँ, सुख-सुविधाएँ चाहिए होते थे। उसका मन कभी संतुष्ट नहीं रहता था।
चोरक एक चोर था | आज भी उसने नगर के एक व्यापारी के घर से बहुमूल्य आभूषण चुराए था और उन्हें अपने वस्त्रों में छिपाकर यहाँ धर्मशाला में आया था ।
रात अधिक होने पर धर्मशाला के सभी यात्री सो गए, पर ये पाँचों जाग रहे थे।
भोला बार-बार दरवाजे की ओर देखता। उसे भय था कि कहीं उस गुंडे के लोग उसे पकड़ने न आ जाएँ।
गरीबदास भविष्य की चिंता में डूबा था। “यदि कल काम न मिला तो परिवार क्या खाएगा?”
रत्नसेन अपने चोरी हुए धन को याद करके दुःखी हो रहा था। वह सोच रहा था—
“काश! मेरा धन वापस मिल जाता।”
कामेश अपने भविष्य के सपने बुन रहा था।
“एक और बड़ा घर बनाना है… और व्यापार बढ़ाना है… और धन कमाना है…” उसकी इच्छाओं का अंत नहीं था।
और चोरक ?
वह सबसे अधिक डरा हुआ था। उसे हर क्षण लगता कि पुलिस वाले उसे पकड़ने आ रहे हैं।
बहुत रात बीतने पर भी उन्हें नींद नहीं आ रही थी |
रात्रि का अंतिम प्रहर था। तभी धर्मशाला में एक सन्यासी आए। उन्होंने देखा कि ये पाँचों व्यक्ति जाग रहे हैं।
सन्यासी ने पूछा, “तुम सब सो क्यों नहीं रहे?”
सन्यासी के इस प्रकार पूछने पर सबने अपनी-अपनी समस्या उन्हें बताई।
उन सबकी बात सुनकर सन्यासी ने कहा—
“तुम पाँचों को अलग-अलग रोग नहीं है। तुम सब एक ही रोग से पीड़ित हो और वह है—अशांत मन।”
सब आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह देखने लगे ।
इसके बाद भोला से उन्होंने कहा—“शक्तिशाली से बिना विचार किए शत्रुता करने पर भय उत्पन्न होता है। भय नींद का सबसे बड़ा शत्रु है। विवेक और धैर्य से इसका समाधान संभव है। ”
गरीबदास से बोले— “अभाव चिंता उत्पन्न करता है। पर चिंता करने से नहीं, पुरुषार्थ करने से समस्या का समाधान होता है।”
रत्नसेन से कहा— “जो चला गया, उसके शोक में डूबे रहने से वर्तमान भी नष्ट हो जाता है। अतः खोई हुई वस्तु का दुःख छोड़कर नए प्रयास करो।”
कामेश से बोले— “इच्छाएँ अग्नि के समान हैं। उनमें जितना घी डालो, वे उतनी ही बढ़ती हैं। संतोष के बिना सुख नहीं मिलता।”
फिर चोरक की ओर देखकर बोले, “अधर्म से प्राप्त वस्तु कभी शांति नहीं देती। चोरी का धन हाथ में हो सकता है, पर मन में भय ही रहता है।”
साधु की बातें सुनकर पाँचों व्यक्ति गम्भीर हो गए।
सन्यासी आगे बोले—
“तुम सबकी दुःख और परेशानी का कारण बाहर नहीं, भीतर है।
भय, अभाव, हानि, लालसा और अपराधबोध—ये पाँच शत्रु मनुष्य की नींद छीन लेते हैं।”
उन पाँचों को सन्यासी के इस गहरे ज्ञान से अत्यंत शांति मिली थी| उन सबने उन्हें प्रणाम किया । अगले सुबह सब लोग वहां से चले गए ।
इसके बाद –
चोरक ने आभूषण उसके स्वामी को लौटा दिए और क्षमा माँगी ।
भोला ने बुद्धिमानी से अपने विवाद का समाधान कर लिया ।
गरीबदास ने चिंता करने के स्थान पर परिश्रम बढ़ाया और धीरे-धीरे उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई।
रत्नसेन ने शोक छोड़कर नया व्यापार आरम्भ किया।
कामेश ने निश्चय किया कि वह अपनी इच्छाओं को सीमित करेगा और धन का कुछ भाग लोककल्याण में लगाएगा।
इस प्रकार कुछ समय बाद वे सभी प्रसन्न और निश्चिंत जीवन जीने लगे । अब उन्हें रात में गहरी नींद आने लगी।
आचार्य श्री ने कथा समाप्त की और फिर रमेश भाई की ओर देखकर कहा—
“प्रिय रमेश भाई! यही बात महात्मा विदुर ने बहुत सुंदर शब्दों में कही है—
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् ।
हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥
अर्थात् “हे राजन्! जिस व्यक्ति का किसी शक्तिशाली व्यक्ति से विवाद या शत्रुता हो गई हो, जो साधनों से रहित हो, जिसकी धन-संपत्ति छिन गई हो, जो अत्यधिक कामनाओं में आसक्त हो तथा जो चोरी करने वाला हो—इन सबको रात में नींद नहीं आती। ”
रमेश भाई के चेहरे पर आश्चर्य और प्रसन्नता एक साथ दिखाई देने लगी।
उसे लगा मानो उसकी पूरी समस्या का चित्रण इसी एक श्लोक में कर दिया गया हो। वह बोला—
“आचार्यवर! अब मैं समझ गया। मेरी नींद मेरे शत्रुओं ने नहीं छीनी, मेरे भय और चिंताओं ने छीनी है।”
आचार्य श्री ने कहा—
“रमेश भाई तुमने सही कहा। हमारी परिस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण हमारे मन की स्थिति होती है। यदि मन संयमित है तो कठिनाइयों में भी शांति मिल सकती है।”
रमेश भाई –“आचार्य जी आपने जिस तरह से विदुर नीति को एक कथा के माध्यम से बताया इससे मैं बहुत प्रभावित हुआ । मैं तो यह भी नहीं जनता था की ‘विदुर-नीति’ जैसा भी कोई महान ज्ञान सनातन धर्म में हैं |”
आचार्य जी – “रमेश भाई यही हमारा दुर्भाग्य है की हमारे पास ज्ञान-विज्ञान का महासागर है लेकिन हमें इसके बारे में अच्छे से कुछ नहीं पता |”
रमेश भाई –“ लेकिन आचार्य जी आपसे मिलने व आपका उपदेश सुनने पर मुझे ये बात अच्छे से समझ आ रही है कि जीवन जीने के सनातन ज्ञान-विज्ञान को जाने बिना हम ऐसे ही सदा दुःख में पड़े रहेंगे |”
इसके बाद रमेश भाई ने आचार्य जी को प्रणाम किया, उन्हें दक्षिणा दी और पुनः आने की अनुमति लेकर अत्यंत प्रसन्न व हल्के मन से वहां से निकला |
उस दिन उसकी समस्याएँ पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई थीं, परंतु उसका दृष्टिकोण बदल गया था। कई दिनों बाद उस रात उसे गहरी और सुखद नींद आई।
और यही विदुर नीति की शिक्षा है कि भय, अभाव, हानि, लालसा और अपराध—ये मनुष्य की शांति के सबसे बड़े शत्रु हैं यही हमारी नींद के चोर हैं ।
