पंचतंत्र की कथा, गुरुकुल-पंचतंत्र, Panchtantra ki katha in Hindi
आज आचार्य जी और उनके शिष्य सायंकाल गुरुकुल के पास से बहने वाली नदी के किनारे घूमने गए। थोड़ी देर टहलने के बाद सब नदी तट पर स्थित शिलाओं पर बैठ गए और ध्यान करने लगे |
ध्यान करने के बाद सबके चहरे प्रसन्नता से चमक रहे थे | बच्चे इसलिए भी प्रसन्न थे क्योंकि आचार्य जी ध्यान के बाद कुछ ना कुछ अच्छी बातें बताते थे या कोई नीति-कथा सुनाते थे |
आचार्य जी – “बच्चों, कल मैंने तुम्हें पंचतंत्र की ‘मित्रभेद’ नामक कथा सुनाई थी। तुम लोगों को बताना है कि इस कथा से तुमने क्या सीखा ? यदि तुम लोगों ने सही उत्तर दिया तो आज एक नई कथा सुनाऊँगा। कौन बताएगा ?”
आचार्य जी के प्रश्न का उत्तर देने के लिए सभी बच्चों ने अपने हाँथ उठाये |
आचार्य जी ने ब्रह्मचारी नमन से उत्तर देने को कहा |
नमन – “आचार्य जी ! मित्रभेद कथा से हमने बहुत कुछ सीखा | लेकिन सबसे मुख्य बात यह थी कि हमें दुष्ट-बुद्धि वाले लोगों का संग कभी नहीं करना चाहिए। वे हमें कभी भी संकट में डाल सकते हैं |”
आचार्य जी – बहुत अच्छे ब्रह्मचारी नमन ! तुमने कथा का सही निष्कर्ष बताया | अब आओ, आज मैं तुम लोगों को एक नई कथा सुनाता हूँ—
मूर्ख बंदर
मणिपट्टन नगर का व्यापारी वर्धमान कई महीनों के बाद व्यापार करके अपने नगर वापस लौटा था। उसने इस बार व्यापार में बहुत धन कमाया था | अतः अपने गुरु से परामर्श करके उसने नगर में एक भव्य अग्नि मंदिर अर्थात यज्ञशाला बनवाने का निर्णय लिया।
इस कार्य के लिए दूर-दूर से कुशल शिल्पकार, राजमिस्त्री और बढ़ई (लकड़ी का काम करने वाले कारीगर) बुलाए गए। प्रतिदिन सुबह से ही वहाँ कार्य प्रारंभ हो जाता था। कोई पत्थरों को तराशता, तो कोई विशाल वृक्षों की लकड़ियों को चीरकर खंभे आदि तैयार करता।
एक दिन काम कर रहे सभी कारीगर और मजदूर दोपहर में भोजन और विश्राम के लिए वहाँ से कुछ समय के लिए चले गए।
जाने से पहले, दो बढ़ई ‘अर्जुन’ वृक्ष के एक बड़े और भारी लट्ठे को बीच से चीर रहे थे। लट्ठा आधा चिरा जा चुका था। उन्होंने लट्ठे के उस आधे चिरे हुए खुले भाग (दरार) के बीच में लकड़ी का एक बड़ा और मजबूत ‘कीला’ (खूँटा) हथौड़े से ठोक दिया जिससे वह दरार खुली रही। इसके बाद वे भी निश्चिंत होकर भोजन व विश्राम करने चले गए।
वानर दल का आगमन और चपलक की चंचलता
कारीगरों के जाने के कुछ ही समय बाद, बंदरों का एक बड़ा दल उछलता-कूदता, हुड़दंग मचाता हुआ उस निर्माणाधीन यज्ञशाला के पास आ गया। यहाँ किसी के ना होने के कारण, बंदरों का उत्साह और बढ़ गया।
वे कभी आधे बने खंभों पर चढ़ते, कभी कारीगरों के वहां पड़े औजारों को छूकर देखते, तो कभी पास के पेड़ों की डालियों को झकझोरते।
उसी वानर दल में एक बंदर था- चपलक । जैसा उसका नाम था, वैसा ही उसका स्वभाव था—अत्यंत चंचल और उद्दंड ।
इधर-उधर छलांग लगाते हुए चपलक की दृष्टि उसी अर्जुन वृक्ष के आधे चिरे हुए लट्ठे पर पड़ी, जिसके बीच में बढ़इयों ने लकड़ी का कीला ठोक रखा था। चपलक उत्सुकतावश उस लट्ठे के ऊपर जाकर बैठ गया। वह ठीक उस जगह बैठा जहाँ लट्ठे में दरार थी। चपलता के कारण, बैठते समय उसने ध्यान नहीं दिया और उसकी लंबी पूंछ उस चिरे हुए लट्ठे की खुली हुई दरार के ठीक बीच में आ गई ।
लट्ठे पर बैठकर चपलक उस कीले को घूरने लगा । वह सोचने लगा,” लकड़ी के बीच में यह खूँटा क्यों है? इसे तो यहाँ नहीं होना चाहिए“
उसने अपने दोनों हाथों से उस कीले को पकड़ लिया और उसे हिलाना शुरू कर दिया।
दल के अन्य बंदरों ने उसे सावधान भी किया कि वह उस अपरिचित वस्तु से दूर रहे।
परंतु चपलक ने किसी की न सुनी। वह अपनी ही धुन में कीले को पूरी ताकत से ऊपर की ओर खींचने लगा। वह कभी कीले पर दांत मारता, तो कभी उसे दोनों हाथों से पकड़कर झटका देता।
धीरे-धीरे, चपलक के लगातार झटके देने के कारण वह मजबूत कीला अपनी जगह से ढीला होने लगा। चपलक खुश हो गया कि वह सफल हो रहा है। फिर उसने अपनी पूरी शक्ति समेटी, पैर लट्ठे पर जमाए और जोर का झटका देकर उस कीले को ऊपर की ओर खींच लिया।
जैसे ही कीला उस दरार से बाहर निकला, लट्ठे के वे दोनों भारी और कड़े हिस्से, एक तड़ाके की आवाज के साथ आपस में जुड़ गए।
चपलक यह पूरी तरह भूल चुका था कि उसकी पूंछ उसी दरार के बीच में फंसी है।
जैसे ही लट्ठे के दोनों भाग आपस में बंद हुए, चपलक की पूँछ उस भारी लट्ठे के बीच फँसकर दब गई।
चपलक दर्द के मारे जोर से चीख पड़ा। उसने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह भारी लट्ठा उससे हिला भी नहीं। दर्द के कारण वह तड़पने लगा। कुछ ही मिनटों की भयंकर पीड़ा के बाद, उसने उसी लट्ठे पर दम तोड़ दिया।
जब कारीगर और मजदूर भोजन करके वापस लौटे, तो उन्होंने चपलक बंदर को मृत पाया।
व्यर्थ के काम में अपनी नाक अड़ाने के कारण चपलक का असमय और दुःखद अंत हो गया।
कथा समाप्त करते हुए आचार्य जी ने कहा – प्रिय बच्चों! इस कथा से सम्बंधित नीति-श्लोक है –
अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति ।
स भूमौ निहतः शेते‚ कीलोत्पाटीव वानरः ।।
अर्थात् जो कार्य किसी के अधिकार या योग्यता से बाहर का हो, लेकिन फिर भी कोई मनुष्य उसे करता है या उसमें हस्तक्षेप करता है, तो वह इस धरती पर उसी प्रकार नष्ट होकर गिरता है या मारा जाता है, जिस प्रकार कीला उखाड़ने वाला वह बंदर नष्ट हो गया।
बच्चों ! पंचतंत्र की यह कथा हमें ‘विवेक’ और ‘मर्यादा’ का पाठ पढ़ाती है। यह सिखाती है कि ऊर्जा और समय अमूल्य हैं; इन्हें व्यर्थ के “अव्यापार” (बिना मतलब के कामों) में नष्ट करने के स्थान पर, अपने “व्यापार” (अपने लक्ष्य और कर्म) में लगाना चाहिए। अन्यथा, बिना सोचे-समझे किया गया कोई भी कार्य हमारा ही नाश कर देगा |
आचार्य जी ने हँसते हुए आगे कहा – क्या तुममें से भी कोई चपलक बन्दर की तरह व्यर्थ का काम करता है ?
आचार्य जी का यह प्रश्न सुनकर सभी बच्चे भी एक-दुसरे का मुँह देखकर हँसने लगे ।